पशु पालन में ध्यान देने योग्य बातें:-
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सभी किसान भाइयों को स्वस्थ पशु समृद्ध किसान पेज की तरफ से राम राम,आज हम बात करेंगे पशुपालन से संबंधित महत्वपूर्ण बातें के बारे में!
प्रति वर्ष खुरपका, गलघोंटू तथा एक टंगिया बीमारी का टीका अपने सभी मवेशियों को अवश्य लगवायें। सभी मवेशियों में तीन माह के अन्तराल में कृमिनाशक दवा अवश्य पिलायें।
– शरीर के बाहर त्वचा में पाये जाने वाले बाह्य परजीवी किल्ली, पेसुआ, जुं आदि को नष्ट करने के लिए हर तीन माह के अंतराल में Amitraz 12% का छिड़काव मवेशी तथा पशुगृह में करें।
– मवेशियों के नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए गाय के गर्मी में आने पर उसे अच्छी नस्ल के सांड सेें या कृत्रिम गभार्धान करवायें।
– एक गाय को प्रतिदिन 4 किलो सूखा चारा (गेंहू भूसा या पैरा कटिया), 10 किलो हरा चारा तथा एक किलो सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा हर तीन किलो दूध उत्पादन हेतु एक किलो अतिरिक्त सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है।
– गाय को प्रतिदिन 50 ग्राम खनिज लवण मिश्रण nutri-diet पाऊडर, 50 ग्राम नमक तथा 2-3 बार भरपूर साफ पानी पीने के लिए दें। पशुगृह को साफ-सुथरा रखें।
– एक गाय को 3.5 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है। गाभिन गाय को आखिरी 60 दिनों का शुष्ककाल देना आवश्यक है। इस अवधि में गाय का दूध निकालना वैज्ञानिक विधि से बंद कर दें।
– गाभिन गाय को आखरी 90 दिनों में 2-3 किलो सान्द्र आहार दाना प्रतिदिन दें, ओर Multivitamin (Vit H) दे जिसमें गर्भ के बछड़े का विकास अच्छे से हो सके और अगले ब्यांत में अधिक दूध उत्पादन मिल सके।
– मवेशी के बीमार होने पर तुरंत निकटतम पशु चिकित्सक से संपर्क करें। यदि नवजात पशु को सांस लेने में कठिनाई हो तो मुंह तथा नाक में अंगुली डालकर म्यूकस (श्लेष्म) की सफाई करें। नाक में घास की पत्ती डालने से भी छींक आ जाती है तथा सांस ठीक होने लगती है। तारपीन के तेल से सीने में दोनों ओर मालिश करने पर भी सांस ठीक होने लगती है।
– नाभिनाल को दो इंच की दूरी में काटकर एंटीसेप्टिक टिंचर आयोडीन या टिंचर बेंजाइन लगायें। मां का पहला दूध जन्म होने के 15 से 30 मिनट के अन्दर पिलाएं। बच्चे के जन्म के पश्चात उसके वजन के हिसाब से (2 से 2.5 कि.ग्रा.) 24 घण्टे के अन्दर 3 से 4 बार पिलायें।
– बछड़ों को सातवें दिन से हरी मुलायम घास तथा 15वें दिन से सान्द्र आहार/प्राथमिक दाना मिश्रण देना शुरू करें।
– पैरों में रक्तस्राव होने परटे हुए स्थान के 2-3 से.मी. ऊपर व नीचे कसकर बांधें। फिटकरी या बर्फ से सिकाई करें। टिंचर बैंजोइन रूई के फाहे में लेकर लगायें।
– पशु के आग से जलने व फफोले पड़ने पर जले भाग पर ठंडा पानी डालें या बर्फ से सिकाई करें। घावों को रगड़ने से बचायें। जले हुए भाग पर चूने का ठंडा पानी व अलसी का तेल बराबर भाग में मिलाकर लगायें।
– पशु के पेट फूलने या अफारे की स्थिति में पीने के लिए पानी बिल्कुल नहीं दें। नमक 100 ग्राम, हींग 30 ग्राम, तारपीन का तेल 100 मि.ली. व अलसी का तेल 500 मि.ली. मिश्रण बनाकर पिला दें।
– लू लगने पर पशु को छायादार स्थान पर रखें। ठंडा करने के लिए बर्फ या ठंडा पानी शरीर पर विशेष रूप से सिर पर डालें। गुड़, आटा व नमक का घोल पिलायें। पशुओं को पुदीना और प्याज का मिश्रण बनाकर खिलायें।ओर वेटकुल प्लस vetcool+ पाउडर 100 ग्राम रोजाना दे।
– ठण्ड लगने पर गुड़ व हल्का गर्म पानी का घोल बार-बार पिलायें। अजवाइन, नमक और अदरक को गुड़ के घोल में मिलाकर पिलायें। तारपीन व सरसों के तेल में कपूर डालकर पशु की मालिश करें।
– दस्त लगने पर गुड़, नमक व आटे का घोल पिलायें। चावल का मांड़ पिलायें। खड़िय़ा 100 ग्राम व कत्था 200 ग्राम मिलाकर पशु को दें।ओर F.A.Q गोली 2-2 सुबह शाम देवे।
= कब्ज होने पर 100 ग्राम नमक, 15 ग्राम हींग, 50 ग्राम सौंफ को 500 ग्राम गुड़ में मिलाकर दिन में चार-पांच बार दें। इसके अलावा 300-400 मिली लीटर अरंडी का तेल पिलायें।
– खुजली होने पर एक लीटर अलसी का तेल में 300 ग्राम गंधक का पाउडर मिलाकर प्रभावित त्वचा पर लगायें। पशु को चूने तथा गन्धक के पानी से नहलाया जा सकता है। इसके अलावा करंज, अलसी, देवदार तथा नीम के तेल भी प्रयोग किया जा सकता है।
– बछड़े के पेट में कीड़े होने पर एक गिलास में दो-तीन चम्मच नमक व एक चम्मच पिसी राई पिलायें। सुपारी का चूरा (5 से 20 ग्राम) देने पर भी लाभ होता है। 250 ग्राम नीम की पत्ती और 250 ग्राम प्याज की पत्ती खिलायें। वयस्क मवेशी को आधा किलो मूली के पत्ते और 250 ग्राम प्याज खिलायें, या 10 से 20 ग्राम सुपारी का चूरा, या 25 ग्राम अमलतास के बीज और 50 ग्राम गुड़ खिलायें, या 4 पलास के बीज का पाउडर तीन चम्मच नमक और एक पाव पानी पिलायें।
– घाव होने पर तारपीन के तेल में रूई लगाकर घाव में भरें। फिटकरी, हल्दी तथा नारियल के तेल का लेप लगायें।
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प्रति वर्ष खुरपका, गलघोंटू तथा एक टंगिया बीमारी का टीका अपने सभी मवेशियों को अवश्य लगवायें। सभी मवेशियों में तीन माह के अन्तराल में कृमिनाशक दवा अवश्य पिलायें।
– शरीर के बाहर त्वचा में पाये जाने वाले बाह्य परजीवी किल्ली, पेसुआ, जुं आदि को नष्ट करने के लिए हर तीन माह के अंतराल में Amitraz 12% का छिड़काव मवेशी तथा पशुगृह में करें।
– मवेशियों के नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए गाय के गर्मी में आने पर उसे अच्छी नस्ल के सांड सेें या कृत्रिम गभार्धान करवायें।
– एक गाय को प्रतिदिन 4 किलो सूखा चारा (गेंहू भूसा या पैरा कटिया), 10 किलो हरा चारा तथा एक किलो सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा हर तीन किलो दूध उत्पादन हेतु एक किलो अतिरिक्त सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है।
– गाय को प्रतिदिन 50 ग्राम खनिज लवण मिश्रण nutri-diet पाऊडर, 50 ग्राम नमक तथा 2-3 बार भरपूर साफ पानी पीने के लिए दें। पशुगृह को साफ-सुथरा रखें।
– एक गाय को 3.5 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है। गाभिन गाय को आखिरी 60 दिनों का शुष्ककाल देना आवश्यक है। इस अवधि में गाय का दूध निकालना वैज्ञानिक विधि से बंद कर दें।
– गाभिन गाय को आखरी 90 दिनों में 2-3 किलो सान्द्र आहार दाना प्रतिदिन दें, ओर Multivitamin (Vit H) दे जिसमें गर्भ के बछड़े का विकास अच्छे से हो सके और अगले ब्यांत में अधिक दूध उत्पादन मिल सके।
– मवेशी के बीमार होने पर तुरंत निकटतम पशु चिकित्सक से संपर्क करें। यदि नवजात पशु को सांस लेने में कठिनाई हो तो मुंह तथा नाक में अंगुली डालकर म्यूकस (श्लेष्म) की सफाई करें। नाक में घास की पत्ती डालने से भी छींक आ जाती है तथा सांस ठीक होने लगती है। तारपीन के तेल से सीने में दोनों ओर मालिश करने पर भी सांस ठीक होने लगती है।
– नाभिनाल को दो इंच की दूरी में काटकर एंटीसेप्टिक टिंचर आयोडीन या टिंचर बेंजाइन लगायें। मां का पहला दूध जन्म होने के 15 से 30 मिनट के अन्दर पिलाएं। बच्चे के जन्म के पश्चात उसके वजन के हिसाब से (2 से 2.5 कि.ग्रा.) 24 घण्टे के अन्दर 3 से 4 बार पिलायें।
– बछड़ों को सातवें दिन से हरी मुलायम घास तथा 15वें दिन से सान्द्र आहार/प्राथमिक दाना मिश्रण देना शुरू करें।
– पैरों में रक्तस्राव होने परटे हुए स्थान के 2-3 से.मी. ऊपर व नीचे कसकर बांधें। फिटकरी या बर्फ से सिकाई करें। टिंचर बैंजोइन रूई के फाहे में लेकर लगायें।
– पशु के आग से जलने व फफोले पड़ने पर जले भाग पर ठंडा पानी डालें या बर्फ से सिकाई करें। घावों को रगड़ने से बचायें। जले हुए भाग पर चूने का ठंडा पानी व अलसी का तेल बराबर भाग में मिलाकर लगायें।
– पशु के पेट फूलने या अफारे की स्थिति में पीने के लिए पानी बिल्कुल नहीं दें। नमक 100 ग्राम, हींग 30 ग्राम, तारपीन का तेल 100 मि.ली. व अलसी का तेल 500 मि.ली. मिश्रण बनाकर पिला दें।
– लू लगने पर पशु को छायादार स्थान पर रखें। ठंडा करने के लिए बर्फ या ठंडा पानी शरीर पर विशेष रूप से सिर पर डालें। गुड़, आटा व नमक का घोल पिलायें। पशुओं को पुदीना और प्याज का मिश्रण बनाकर खिलायें।ओर वेटकुल प्लस vetcool+ पाउडर 100 ग्राम रोजाना दे।
– ठण्ड लगने पर गुड़ व हल्का गर्म पानी का घोल बार-बार पिलायें। अजवाइन, नमक और अदरक को गुड़ के घोल में मिलाकर पिलायें। तारपीन व सरसों के तेल में कपूर डालकर पशु की मालिश करें।
– दस्त लगने पर गुड़, नमक व आटे का घोल पिलायें। चावल का मांड़ पिलायें। खड़िय़ा 100 ग्राम व कत्था 200 ग्राम मिलाकर पशु को दें।ओर F.A.Q गोली 2-2 सुबह शाम देवे।
= कब्ज होने पर 100 ग्राम नमक, 15 ग्राम हींग, 50 ग्राम सौंफ को 500 ग्राम गुड़ में मिलाकर दिन में चार-पांच बार दें। इसके अलावा 300-400 मिली लीटर अरंडी का तेल पिलायें।
– खुजली होने पर एक लीटर अलसी का तेल में 300 ग्राम गंधक का पाउडर मिलाकर प्रभावित त्वचा पर लगायें। पशु को चूने तथा गन्धक के पानी से नहलाया जा सकता है। इसके अलावा करंज, अलसी, देवदार तथा नीम के तेल भी प्रयोग किया जा सकता है।
– बछड़े के पेट में कीड़े होने पर एक गिलास में दो-तीन चम्मच नमक व एक चम्मच पिसी राई पिलायें। सुपारी का चूरा (5 से 20 ग्राम) देने पर भी लाभ होता है। 250 ग्राम नीम की पत्ती और 250 ग्राम प्याज की पत्ती खिलायें। वयस्क मवेशी को आधा किलो मूली के पत्ते और 250 ग्राम प्याज खिलायें, या 10 से 20 ग्राम सुपारी का चूरा, या 25 ग्राम अमलतास के बीज और 50 ग्राम गुड़ खिलायें, या 4 पलास के बीज का पाउडर तीन चम्मच नमक और एक पाव पानी पिलायें।
– घाव होने पर तारपीन के तेल में रूई लगाकर घाव में भरें। फिटकरी, हल्दी तथा नारियल के तेल का लेप लगायें।
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