Wednesday, August 22, 2018

पशु पालन में ध्यान देने योग्य बातें:-
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सभी किसान भाइयों को स्वस्थ पशु समृद्ध किसान पेज की तरफ से राम राम,आज हम बात करेंगे पशुपालन से संबंधित महत्वपूर्ण बातें के बारे में!

प्रति वर्ष खुरपका, गलघोंटू तथा एक टंगिया बीमारी का टीका अपने सभी मवेशियों को अवश्य लगवायें। सभी मवेशियों में तीन माह के अन्तराल में कृमिनाशक दवा अवश्य पिलायें।
– शरीर के बाहर त्वचा में पाये जाने वाले बाह्य परजीवी किल्ली, पेसुआ, जुं आदि को नष्ट करने के लिए हर तीन माह के अंतराल में Amitraz 12% का छिड़काव मवेशी तथा पशुगृह में करें।
– मवेशियों के नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए गाय के गर्मी में आने पर उसे अच्छी नस्ल के सांड सेें या कृत्रिम गभार्धान करवायें।
– एक गाय को प्रतिदिन 4 किलो सूखा चारा (गेंहू भूसा या पैरा कटिया), 10 किलो हरा चारा तथा एक किलो सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा हर तीन किलो दूध उत्पादन हेतु एक किलो अतिरिक्त सान्द्र आहार दाने की आवश्यकता होती है।
– गाय को प्रतिदिन 50 ग्राम खनिज लवण मिश्रण nutri-diet पाऊडर, 50 ग्राम नमक तथा 2-3 बार भरपूर साफ पानी पीने के लिए दें। पशुगृह को साफ-सुथरा रखें।
– एक गाय को 3.5 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है। गाभिन गाय को आखिरी 60 दिनों का शुष्ककाल देना आवश्यक है। इस अवधि में गाय का दूध निकालना वैज्ञानिक विधि से बंद कर दें।
– गाभिन गाय को आखरी 90 दिनों में 2-3 किलो सान्द्र आहार दाना प्रतिदिन दें, ओर Multivitamin (Vit H) दे जिसमें गर्भ के बछड़े का विकास अच्छे से हो सके और अगले ब्यांत में अधिक दूध उत्पादन मिल सके।
– मवेशी के बीमार होने पर तुरंत निकटतम पशु चिकित्सक से संपर्क करें। यदि नवजात पशु को सांस लेने में कठिनाई हो तो मुंह तथा नाक में अंगुली डालकर म्यूकस (श्लेष्म) की सफाई करें। नाक में घास की पत्ती डालने से भी छींक आ जाती है तथा सांस ठीक होने लगती है। तारपीन के तेल से सीने में दोनों ओर मालिश करने पर भी सांस ठीक होने लगती है।
– नाभिनाल को दो इंच की दूरी में काटकर एंटीसेप्टिक टिंचर आयोडीन या टिंचर बेंजाइन लगायें। मां का पहला दूध जन्म होने के 15 से 30 मिनट के अन्दर पिलाएं। बच्चे के जन्म के पश्चात उसके वजन के हिसाब से (2 से 2.5 कि.ग्रा.) 24 घण्टे के अन्दर 3 से 4 बार पिलायें।
– बछड़ों को सातवें दिन से हरी मुलायम घास तथा 15वें दिन से सान्द्र आहार/प्राथमिक दाना मिश्रण देना शुरू करें।
– पैरों में रक्तस्राव होने परटे हुए स्थान के 2-3 से.मी. ऊपर व नीचे कसकर बांधें। फिटकरी या बर्फ से सिकाई करें। टिंचर बैंजोइन रूई के फाहे में लेकर लगायें।
– पशु के आग से जलने व फफोले पड़ने पर जले भाग पर ठंडा पानी डालें या बर्फ से सिकाई करें। घावों को रगड़ने से बचायें। जले हुए भाग पर चूने का ठंडा पानी व अलसी का तेल बराबर भाग में मिलाकर लगायें।
– पशु के पेट फूलने या अफारे की स्थिति में पीने के लिए पानी बिल्कुल नहीं दें। नमक 100 ग्राम, हींग 30 ग्राम, तारपीन का तेल 100 मि.ली. व अलसी का तेल 500 मि.ली. मिश्रण बनाकर पिला दें।
– लू लगने पर पशु को छायादार स्थान पर रखें। ठंडा करने के लिए बर्फ या ठंडा पानी शरीर पर विशेष रूप से सिर पर डालें। गुड़, आटा व नमक का घोल पिलायें। पशुओं को पुदीना और प्याज का मिश्रण बनाकर खिलायें।ओर वेटकुल प्लस vetcool+ पाउडर 100 ग्राम रोजाना दे।
– ठण्ड लगने पर गुड़ व हल्का गर्म पानी का घोल बार-बार पिलायें। अजवाइन, नमक और अदरक को गुड़ के घोल में मिलाकर पिलायें। तारपीन व सरसों के तेल में कपूर डालकर पशु की मालिश करें।
–  दस्त लगने पर गुड़, नमक व आटे का घोल पिलायें। चावल का मांड़ पिलायें। खड़िय़ा 100 ग्राम व कत्था 200 ग्राम मिलाकर पशु को दें।ओर F.A.Q गोली 2-2 सुबह शाम देवे।
= कब्ज होने पर 100 ग्राम नमक, 15 ग्राम हींग, 50 ग्राम सौंफ को 500 ग्राम गुड़ में मिलाकर दिन में चार-पांच बार दें। इसके अलावा 300-400 मिली लीटर अरंडी का तेल पिलायें।
– खुजली होने पर एक लीटर अलसी का तेल में  300 ग्राम गंधक का पाउडर मिलाकर प्रभावित त्वचा पर लगायें। पशु को चूने तथा गन्धक के पानी से नहलाया जा सकता है। इसके अलावा करंज, अलसी, देवदार तथा नीम के तेल भी प्रयोग किया जा सकता है।
– बछड़े के पेट में कीड़े होने पर एक गिलास में दो-तीन चम्मच नमक व एक चम्मच पिसी राई पिलायें। सुपारी का चूरा (5 से 20 ग्राम) देने पर भी लाभ होता है। 250 ग्राम नीम की पत्ती और 250 ग्राम प्याज की पत्ती खिलायें। वयस्क मवेशी को आधा किलो मूली के पत्ते और 250 ग्राम प्याज खिलायें, या 10 से 20 ग्राम सुपारी का चूरा, या 25 ग्राम अमलतास के बीज और 50 ग्राम गुड़ खिलायें, या 4 पलास के बीज का पाउडर तीन चम्मच नमक और एक पाव पानी पिलायें।
– घाव होने पर तारपीन के तेल में रूई लगाकर घाव में भरें। फिटकरी, हल्दी तथा नारियल के तेल का लेप लगायें।
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Sunday, August 12, 2018

डेयरी पालन भैंस पालन से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव एवं जानकारियां

भैंस पालन डेयरी पालन से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव एवं जानकारियां :-
                  "स्वस्थ पशु समृद्ध किसान" पेज पर आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे डेयरी पालन और मुख्यतः भैंस पालन से संबंधित महत्वपूर्ण बातों की भारत कुछ में 55 प्रतिशत दूध अर्थात 20 मिलियन टन दूध भैंस पालन से मिलता है। भारत में तीन तरह की भैंसें मिलती हैं, जिनमें मुर्रा, मेहशाना और सुरती प्रमुख हैं। मुर्रा भैंसों की प्रमुख ब्रीड मानी जाती है। यह ज्यादातर हरियाणा और पंजाब में पाई जाती है। राज्य सरकारों ने भी इस नस्ल की भैंसों की विस्तृत जानकारी की हैंड बुक एग्रीकल्चर रिसर्च काउंसिल इंडियन सेंटर (भारत सरकार) ने जारी की है। मेहसना मिक्स ब्रीड है। यह गुजरात तथा महाराष्ट्र में पाई जाती है। इस नस्ल की भैंस 1200 से 3500 लीटर दूध एक महीने में देती हैं। सुरति इनमें छोटी नस्ल की भैंस है। यह खड़े सींगों वाली भैंस है। यह नस्ल भी गुजरात में पाई जाती है। यह एक महीने में 1600 से 1800 लीटर दूध देती है।

डेयरी उद्योग के लिए शैक्षिक योग्यता:-

गाय व भैंस पालन उद्योग में प्रशिक्षण प्राप्ति के लिए कोई निश्चित शैक्षिक योग्यता या आयु सीमा निधारित नहीं है। कोई भी युवा, जो डेयरी पालन के क्षेत्र में स्वरोजगार अपनाना चाहता है, वह एडमिशन ले सकता है, लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार का 60 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी होना जरूरी है।

परामर्श
डेयरी पालन के लिए यह जरूरी है कि गाय व भैंसों को खुली जगह में रखा जाए, लेकिन जाड़ों में बचाव के लिए गाय व भैंसों की लंबाई व चौड़ाई के अनुपात के हिसाब से उनके लिए घर बना हो। कमरों में हवा का आवागमन होता रहे।

डेयरी पालन उद्योग कैसे शुरू करें
यह उद्योग 5 से 10 गाय या भैंस के साथ शुरू किया जा सकता है।

आहार
गाय या भैंसों को एक निश्चित समय पर भोजन दिया जाना जरूरी है। रोजाना खली में मिला चारा दो वक्त दिया जाना चाहिए। इसके अलावा बरसीम, ज्वार व बाजरे का चारा दिया जाना चाहिए। दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए बिनौले का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डेयरी मालिक यह भी ध्यान रखें कि आहार बारीक, साफ-सुथरा हो, ताकि जानवर अपने आहार को चाव से खा सके। इन्हें 32 लीटर पानी अवश्य पिलाया जाए। इनके स्वास्थ्य के लिए इतना पानी जरूरी है।

बचाव
डेयरी पालकों को चाहिए कि वे दर्द निवारक दवाओं को अपने पास रखें, ताकि जरूरत पर उनका उपयोग किया जा सके। गाय व भैंसों को अलग-अलग खूंटों पर बांधना चाहिए, क्योंकि तंग जगह में पशुओं को बीमारी होने का डर रहता है। चिकनपॉक्स, पैर व मुंह की बीमारी आम बात है, इसलिए समय-समय पर पशु-चिकित्सकों से भी सलाह लेते रहना चाहिए।

ऋण-सहायता
सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाएं डेयरी पालन उद्योग के लिए 10 लाख रुपए तक की धनराशि उपलब्ध करवाती है। इसके लिए डेयरी पालक को तमाम कागज जैसे एनओसी, एसडीएम प्रमाणपत्र, बिजली का बिल, आधार कार्ड, डेयरी का नवीनतम फोटो आदि जमा करवाने होते हैं। डेयरी की वेरीफिकेशन के बाद अगर ऑफिसर संतुष्ट होंगे तो डेयरी पालक को डेरी व पशुओं की संख्या के हिसाब से 5 से 10 लाख रुपए तक की राशि मुहैया करवाई जाती है। इसके कुछ दिनों बाद यह राशि किस्तों में जमा करवानी होती है। किस्तों का नियमित भुगतान करने पर कुछ किस्तें माफ कर दी जाती हैं।

प्रशिक्षण संस्थान
नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट
(एन डी आर आई) करनाल, हरियाणा

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिटय़ूूट
आणंद, (गुजरात)

बैंक डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन, पुणे, महाराष्ट्र

भैंस पालन में आहार
भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भैंस पालन की मुख्य भूमिका है। इसका प्रयोग दुग्ध व मांस उत्पादन एंव खेती के कार्यों में होता है। आमतौर पर भैंस विश्व के ऐसे क्षेत्रों में पायी जाती है जहां खेती से प्राप्त चारे एवं चरागाह सीमित मात्रा में हैं। इसी कारण भैंसों की खिलार्इ-पिलार्इ में निश्कृष्ट चारों के साथ कुछ हरे चारे, कृषि उपोत्पाद, भूसा, खल आदि का प्रयोग होता है। गाय की अपेक्षा भैंस ऐसे भोजन का उपयोग करने में अधिक सक्ष्म है जिनमें रेशे की मात्रा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त भैंस गायों की अपेक्षा वसा, कैल्शियम, फास्फोरस एवं अप्रोटीन नाइट्रोजन को भी उपयोग करने में अधिक सक्षम है। जब भैंस को निश्कृश्ट चारे पर रखा जाता है। तो वह इतना भोजन ग्रहण नहीं कर पाती जिससे उसके अनुरक्षण बढ़वार, जनन, उत्पाद एवं कार्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसी कारण से भैंसों में आशातीत बढ़वार नहीं हो पाती और उनके पहली बार ब्याने की उम्र 3.5 से 4 वर्ष तक आती है। अगर भैंसों की भली प्रकार देखभाल व खिलार्इ-पिलार्इ की जाये और आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध करवाये जायें तो इनकी पहली बार ब्याने की उम्र को तीन साल से कम किया जा सकता है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

पोषण का उद्देश्य:-

शरीर को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए पोषण की आवश्यकता होती है, जो उसे आहार से प्राप्त होता है। पशु आहार में पाये जाने वाले विभिन्न पदार्थ शरीर की विभिन्न क्रियाओं में इस प्रकार उपयोग में आते हैं।

पशु आहार शरीर के तापमान को बनाये रखने के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।
यह शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं, श्वासोच्छवास, रक्त प्रवाह और समस्त शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं हेतु ऊर्जा प्रदान करता है।
यह शारीरिक विकास, गर्भस्थ शिशु की वृद्धि तथा दूध उत्पादन आदि के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
यह कोशिकाओं और उतकों की टूट-फूट, जो जीवन पर्यन्त होती रहती है, की मरम्मत के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करता है।
भैंस पालन के आहार के तत्व:-

रासायनिक संरचना के अनुसार कार्बोहाइड्रेट,वसा, प्रोटीन,विटामिन तथा खनिज लवण भोजन के प्रमुख तत्व हैं। डेयरी पशु शाकाहारी होते हैं अत: ये सभी तत्व उन्हें पेड़ पौधों से, हरे चारे या सूखे चारे अथवा दाने  से प्राप्त होते हैं।

कार्बोहाइड्रेट – कार्बोहाइड्रेट मुख्यत: शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसकी मात्रा पशुओं के चारे में सबसे अधिक होती है । यह हरा चारा, भूसा, कड़बी तथा सभी अनाजों से प्राप्त होते हैं।

प्रोटीन –    प्रोटीन शरीर की संरचना का एक प्रमुख तत्व है। यह प्रत्येक कोशिका की दीवारों तथा आंतरिक संरचना का प्रमुख अवयव है। शरीर की वृद्धि, गर्भस्थ शिशु की वृद्धि तथा दूध उत्पादन के लिए प्रोटीन आवश्यक होती है। कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत के लिए भी प्रोटीन बहुत जरूरी होती है। पशु को प्रोटीन मुख्य रूप से खल, दालों तथा फलीदार चारे जैसे बरसीम, रिजका, लोबिया, ग्वार आदि से प्राप्त होती है।

वसा –      पानी में न घुलने वाले चिकने पदार्थ जैसे घी, तेल इत्यादि वसा कहलाते हैं। कोशिकाओं की संरचना के लिए वसा एक आवश्यक तत्व है। यह त्वचा के नीचे या अन्य स्थानों पर जमा होकर, ऊर्जा के भंडार के रूप में काम आती है एवम् भोजन की कमी के दौरान उपयोग में आती है। पशु के आहार में लगभग 3-5 प्रतिशत वसा की आवश्यकता होती है जो उसे आसानी से चारे और दाने से प्राप्त हो जाती है। अत: इसे अलग से देने की आवश्यकता नहीं होती। वसा के मुख्य स्रोत – बिनौला, तिलहन, सोयाबीन व विभिन्न प्रकार की खलें हैं।

विटामिन –  शरीर की सामान्य क्रियाशीलता के लिए पशु को विभिन्न विटामिनों की आवश्यकता होती है। ये विटामिन उसे आमतौर पर हरे चारे से पर्याप्त मात्राा में उपलब्ध हो जाते हैं। विटामिन ‘बी’ तो पशु के पेट में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा पर्याप्त मात्रा में संश्लेषित होता है। अन्य विटामिन जैसे ए, सी, डी, र्इ तथा के, पशुओं को चारे और दाने द्वारा मिल जाते हैं। विटामिन ए की कमी से भैंसो में गर्भपात, अंधापन, चमड़ी का सूखापन, भूख की कमी, गर्मी में न आना तथा गर्भ का न रूकना आदि समस्यायें हो जाती हैं।

खनिज लवण- खनिज लवण मुख्यत: हड्डियों तथा दांतों की रचना के मुख्य भाग हैं तथा दूध में भी काफी मात्रा में स्रावित होते हैं। ये शरीर के एन्जाइम और विटामिनों के निर्माण में काम आकर शरीर की कर्इ महत्वपूर्ण क्रियाओं को निष्पादित करते हैं। इनकी कमी से शरीर में कर्इ प्रकार की बीमारियाँ हो जाती हैं। कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, क्लोरीन, गंधक, मैग्निशियम, मैंगनीज, लोहा, तांबा, जस्ता, कोबाल्ट, आयोडीन, सेलेनियम इत्यादि शरीर के लिए आवश्यक प्रमुख लवण हैं। दूध उत्पादन की अवस्था में भैंस को कैल्शियम तथा फास्फोरस की अधिक आवश्यकता होती है। प्रसूति काल में इसकी कमी से दुग्ध ज्वर हो जाता है तथा बाद की अवस्थाओं में दूध उत्पादन घट जाता है एवम् प्रजनन दर में भी कमी आती है। कैल्शियम की कमी के कारण ग्याभिन भैंसें फूल दिखाती हैं। क्योंकि चारे में उपस्थित खनिज लवण भैंस की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते, इसलिए खनिज लवणों को अलग से खिलाना आवश्यक हैै।

भैंस पालन के लिए आहार की विशेषतायें :-

 1.आहार संतुलित होना चाहिए। इसके लिए दाना मिश्रण में प्रोटीन तथा ऊर्जा के स्रोतों एवम् खनिज लवणों का समुचित समावेश होना चाहिए।

2.यह सस्ता होना चाहिए।

3. आहार स्वादिष्ट व पौष्टिक होना चाहिए। इसमें दुर्गंध नहीं आनी चाहिए।

4.दाना मिश्रण में अधिक से अधिक प्रकार के दाने और खलों को मिलाना चाहिये। इससे दाना मिश्रण की गुणवत्ता तथा स्वाद दोनों में बढ़ोतरी होती है।

5.आहार सुपाच्य होना चाहिए। कब्ज करने वाले या दस्त करने वाले चारे/को नहीं खिलाना चाहिए।

6,भैंस को भरपेट चारा खिलाना चाहिए। भैसों का पेट काफी बड़ा होता है और पेट पूरा भरने पर ही उन्हें संतुष्टि मिलती है। पेट खाली रहने पर वह मिट्टी, चिथड़े व अन्य अखाद्य एवं गन्दी चीजें खाना शुरू कर देती है जिससे पेट भर कर वह संतुष्टि का अनुभव कर सकें।

7.उम्र व दूध उत्पादन के हिसाब से प्रत्येक भैंस को अलग-अलग खिलाना चाहिए ताकि जरूरत के अनुसार उन्हें अपनी पूरी खुराक मिल सके।

8.भैंस पालन के आहार में हरे चारे की मात्राा अधिक होनी चाहिए।

9.भैंस पालन के आहार को अचानक नहीं बदलना चाहिए। यदि कोर्इ बदलाव करना पड़े तो पहले वाले आहार के साथ मिलाकर धीरे-धीरे आहार में बदलाव करें।

10.भैंस को खिलाने का समय निश्चित रखें। इसमें बार-बार बदलाव न करें। आहार खिलाने का समय ऐसा रखें जिससे भैंस अधिक समय तक भूखी न रहे।

11.दाना मिश्रण ठीक प्रकार से पिसा होना चाहिए। यदि साबुत दाने या उसके कण गोबर में दिखार्इ दें तो यह इस बात को इंगित करता है कि दाना मिश्रण ठीक प्रकार से पिसा नहीं है तथा यह बगैर पाचन क्रिया पूर्ण हुए बाहर निकल रहा है। परन्तु यह भी ध्यान रहे कि दाना मिश्रण बहुत बारीक भी न पिसा हो। खिलाने से पहले दाना मिश्रण को भिगोने से वह सुपाच्य तथा स्वादिष्ट हो जाता है।

12.दाना मिश्रण को चारे के साथ अच्छी तरह मिलाकर खिलाने से कम गुणवत्ता व कम स्वाद वाले चारे की भी खपत बढ़ जाती है। इसके कारण चारे की बरबादी में भी कमी आती है। क्योंकि भैंस चुन-चुन कर खाने की आदत के कारण बहुत सारा चारा बरबाद करती है।

भैंस पालन के लिये आहार स्रोत:-

 भैसों के लिए उपलब्ध खाद्य सामग्री को हम दो भागों में बाँट सकते हैं – चारा और दाना । चारे में रेशेयुक्त तत्वों की मात्रा शुष्क भार के आधार पर 18 प्रतिशत से अधिक होती है तथा समस्त पचनीय तत्वों की मात्रा 60 प्रतिशत से कम होती है। इसके विपरीत दाने में रेशेयुक्त तत्वों की मात्रा 18 प्रतिशत से कम तथा समस्त पचनीय तत्वों की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक होती है।

 चारा  – नमी के आधार पर चारे को दो भागों में बांटा जा सकता है – सूखा चारा और हरा चारा

सूखा चारा :  चारे में नमी की मात्रा यदि 10-12 प्रतिशत से कम है तो यह सूखे चारे की श्रेणी में आता है। इसमें गेहूं का भूसा, धान का पुआल व ज्वार, बाजरा एवं मक्का की कड़वी आती है। इनकी गणना घटिया चारे के रूप में की जाती है।

 हरा चारा :   चारे में नमी की मात्रा यदि 60-80 प्रतिशत हो तो इसे हरा/रसीला चारा कहते हैं। पशुओं के लिये हरा चारा दो प्रकार का होता है दलहनी तथा बिना दाल वाला। दलहनी चारे में बरसीम, रिजका, ग्वार, लोबिया आदि आते हैं। दलहनी चारे में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। अत: ये अधिक पौष्टिक तथा उत्तम गुणवत्ता वाले होते हैं। बिना दाल वाले चारे में ज्वार, बाजरा, मक्का, जर्इ, अगोला तथा हरी घास आदि आते हैं।  दलहनी चारे की अपेक्षा इनमें प्रोटीन की मात्राा कम होती है। अत: ये कम पौष्टिक होते हैं। इनकी गणना मध्यम चारे के रूप में की जाती है।

 दाना  :   पशुओं के लिए उपलब्ध खाद्य पदार्थों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं – प्रोटीन युक्त  और ऊर्जायुक्त खाद्य पदार्थ। प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ में तिलहन, दलहन व उनकी चूरी और सभी खलें, जैसे सरसों की खल, बिनौले की खल, मूँगफली की खल, सोयाबीन की खल, सूरजमुखी की खल आदि आते हैं। इनमें प्रोटीन की मात्रा 18 प्रतिशत से अधिक होती है।

ऊर्जायुक्त दाने में सभी प्रकार के अनाज, जैसे गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, जर्इ, जौ तथा गेहूँ, मक्का व धान का चोकर, चावल की पॉलिस, चावल की किन्की, गुड़ तथा शीरा आदि आते हैं। इनमें प्रोटीन की मात्रा 18 प्रतिशत से कम होती है।

संतुलित आहार :

संतुलित आहार उस भोजन सामग्री को कहते हैं जो किसी पशु विशेष की 24 घन्टे की निर्धारित पौषाणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। संतुलित राशन में कार्बन, वसा और प्रोटीन के आपसी विशेष अनुपात के लिए कहा गया है। सन्तुलित राशन में मिश्रण के विभिन पदार्थ की मात्रा मौसम और पशु भार तथा उसकी उत्पादन क्षमता के अनुसार रखी जाती है। एक राशन की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है ‘एक भैंस  24 घण्टे में जितना भोजन अन्तग्रहण करती है, वह राशन कहलाता है।’ डेरी राशन या तो संतुलित होगा या असंतुलित होगा। असंतुलित राशन वह होता है जोकि भैंस को 24 घण्टों में जितने पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है वह देने में असफल रहता है जबकि संतुलित राशन ‘ठीक’ भैंस को ‘ठीक’ समय पर ‘ठीक’  मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करता है। संतुलित आहार में प्रोटीन, कार्बोहार्इड्रेट, मिनरल्स तथा विटामिनों की मात्रा पशु की आवश्यकता अनुसार उचित मात्रा में रखी जाती है|भैंस को जो आहार खिलाया जाता है, उसमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उसे जरूरत के अनुसार शुष्क पदार्थ, पाचक प्रोटीन तथा कुल पाचक तत्व उपलब्ध हो सकें। भैंस में शुष्क पदार्थ की खपत प्रतिदिन 2.5 से 3.0 किलोग्राम प्रति 100 किलोग्राम शरीर भार के अनुसार होती है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 400 किलोग्राम वजन की भैंस को रोजाना 10-12 किलोग्राम शुष्क पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है। इस शुष्क पदार्थ को हम चारे और दाने में विभाजित करें तो शुष्क पदार्थ का लगभग एक तिहार्इ हिस्सा दाने के रूप में खिलाना चाहिए।

उत्पादन व अन्य आवश्यकताओं के अनुसार जब हम पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा निकालते हैं तो यह गणना काफी कठिन हो जाती है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि जो चारा पशु को खिलाया जाता है उसमें पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा ज्ञात करना किसान के लिए लगभग असंभव है। ऐसा इसलिए है कि पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा प्रत्येक चारे के लिए अलग होती है। यह चारे की उम्र/परिपक्वता के अनुसार बदल जाती है। अनेक बार उपलब्धता के आधार पर कर्इ प्रकार का चारा एक साथ मिलाकर खिलाना पड़ता है। किसान चारे को कभी भी तोलकर नहीं खिलाता है। इन परिस्थितियों में सबसे आसान तरीका यह है कि किसान द्वारा खिलाये जाने वाले चारे की गणना यह मान कर की जाये की पशु को चारा भरपेट मिलता रहे। अब पशु की जरूरत के अनुसार पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों में कमी की मात्रा को दाना मिश्रण देकर पूरा कर दिया जाता है। इस प्रकार भैंस को खिलाया गया आहार संतुलित हो जाता है।



भैंस पालन के संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें ?

पशुओं के दाना मिश्रण में काम आने वाले पदार्थों का नाम जान लेना ही काफी नही है।क्योंकि यह ज्ञानपशुओं का राशन परिकलन करने के लिए काफी नही है। एक पशुपालक को इस से प्राप्त होने वाले पाचकतत्वों जैसे कच्ची प्रोटीन, कुल पाचक तत्व और चयापचयी उर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी भोज्य में पाये जाने वाले तत्वों के आधार पर संतुलित दाना मिश्रण बनाने में सहायता मिल सकेगी। नीचे लिखे गये किसी भी एक तरीके से यह दाना मिश्रण बनाया जा सकता है, परन्तु यह इस पर भी निर्भर करता है कि कौन सी चीज सस्ती व आसानी से उपलब्ध है।

    मक्का/जौ/जर्इ        40 किलो मात्रा
        बिनौले की खल      16 किलो

        मूंगफली की खल     15 किलो

        गेहूं की चोकर       25 किलो

        मिनरल मिक्सर      02 किलो

        साधारण नमक       01 किलो

        कुल              100 किलो

         जौ               30 किलो

        सरसों की खल       25 किलो

        बिनौले की खल      22 किलो

        गेहूं की चोकर        20 किलो

मिनरल मिक्स       02 किलो

साधारण नमक       01 किलो

 कुल              100 किलो

मक्का या जौ        40 किलो मात्रा

मूंगफली की खल     20 किलो

दालों की चूरी        17 किलो

चावल की पालिश     20 किलो

मिनरल मिक्स       02 किलो

साधारण नमक       01 किलो

कुल              100 किलो

गेहूं               32 किलो मात्रा

सरसों की खल       10 किलो

मूंगफली की खल     10 किलो

बिनौले की खल      10 किलो

दालों की चूरी        10 किलो

चौकर             25 किलो

मिनरल मिक्स       02 किलो

नमक             01 किलो

 कुल            100 किलो



दाना मिश्रण के गुण व लाभ

यह स्वादिष्ट व पौष्टिक है।
ज्यादा पाचक है।
अकेले खल, बिनौला या चने से यह सस्ता पड़ता हैं।
पशुओं का स्वास्थ्य ठीक रखता है।
बीमारी से बचने की क्षमता प्रदान करता हैं।
दूध व घी में भी बढौतरी करता है।
भैंस ब्यांत नहीं मारती।
भैंस अधिक समय तक दूध देते हैं।
कटडे या कटड़ियों को जल्द यौवन प्रदान करता है।
संतुलित दाना मिश्रण कितना खिलायें

शरीर की देखभाल के लिए:
गाय के लिए 5 किलो प्रतिदिन व भैंस के लिए 2 किलो प्रतिदिन
दुधारूपशुओं के लिए:
गाय प्रत्येक 5 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
भैंस प्रत्येक 2 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
गाभिन गाय या भैंस के लिए:
6 महीने से ऊपर की गाभिन गाय या भैंस को 1 से 5 किलो दाना प्रतिदिन फालतू देना चाहिए।
बछड़े, बछड़ियों के लिए:
1 किलो से 5 किलो तक दाना प्रतिदिन उनकी उम्र या वजन के अनुसार देना चाहिए।
बैलों के लिए:
खेतो में काम करने वाले भैंसों के लिए 2 से 5 किलो प्रतिदिन
बिना काम करने वाले बैलों के लिए 1 किलो प्रतिदिन।
नोट : जब हरा चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो तो उपरलिखित कुल देय दाना 1/2 से 1 किलो तक घटाया जा सकता है।

रोग नियंत्रण
अगर आपका पशु स्वस्थ्य नहीं होगा तो आप उससे अच्छा दूध उत्पादन भी नहीं कर सकेंगे। इसलिए जरूरी की आप अपनी भैंस को पेट के कीड़े की दवा, खुरपका-मुंहपका, गलाघोटू का टीका लगवाना चाहिए। साथ ही भैंसों में होने वाला थनैला रोग के लक्षण को पहचाने और उनका तुरंत इलाज कराएं।

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Saturday, August 11, 2018

पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव एवं जानकारियां

पशुऔ में कृत्रिम गर्भाधान:-
                               कृत्रिम विधि से नर पशु से वीर्य एकत्रित करके मादा पशु की प्रजनन नली में रखने की प्रक्रिया को कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं| भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में कृत्रिम गर्भाधान का प्रथम प्रयोग किया गया था| आज सम्पूर्ण भारत वर्ष तथा विश्व में पालतू पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान की विधि अपनायी जा रही है|

गहन हिम्कृत वीर्य द्वारा पशुओं में गर्भाधान की विधि:-
                                                 आजकल सम्पूर्ण विश्व में ज्यादातर गहन हिम्कृत वीर्य का ही प्रयोग होने लगा है| इसमें एक प्रशिक्षित व्यक्ति हिम्कृत वीर्य को पुन: द्रव अवथा में लाकर कृत्रिम गर्भाधान गन की सहायता से रेक्टोविजायनल विधि द्वारा गर्मायी हुई मादा की प्रजनन नली में डालता है|

कृत्रिम गर्भाधान की विधि:-
                     आरंभ में कृ०ग० विजाइनल विधि द्वारा किया जाता था जिसमें वीर्य को विजाइनल स्पैकुलम की सहायता से कृ०ग० केथेटर द्वारा पशु की गर्भाशय ग्रीवा में रखा जाता था| लेकिन अब पूरे विश्व में रेकटो विजाइनल विधि द्वारा कृ०ग० किया जाता है| इस विधि में कृ०ग० तक्नीशियन अपने बायें हाथ को साबुन-पायी या तेल आदि से चिकना करके उसे कृ०ग० के लिये आए पशु की गुदा में डालता है और गर्भाशय ग्रीवा को हाथ में पकड़ लेता है| तत्पश्चात वह दूसरे हाथ में कृ०ग० गन को योनि में प्रविष्ट करते हुए उसे ग्रीवा तक पहुंचता है तथा गुदा में स्थित हाथ के अंगूठे की सहायता से गन को ग्रीवा के बाहरी द्वार में प्रविष्ट करा देता है| इसके पश्चात ग्रीवा की सम्पूर्ण लम्बाई को पार करते हुए गन के सिरे को गर्भाशय बाडी में पहुंचाया जाता है| फिर दाहिने हाथ से पिस्टल दबाकर गन में भरे वीर्य को वहां छोड़ दिया जाता है|

विजाइनल स्पैकुलम विधि की तुलना में रेक्टोविजाइनल विधि के निम्न लिखित प्रमुख लाभ हैं:-
(1) गुदा में हाथ डाल कर पशु के प्रजनन अंगों का भली प्रकार परीक्षण किया जा सकता है तथा उसकी गर्मी का सही पता लग जाता है|
(2) अनेक बार गर्भ धारण किए पशु भी गर्मीं में आ जाते हैं और उन्हें अज्ञानता में गर्भाधान के लिए ले जाया जाता है| ऐसे पशु का इस विधि द्वरा गर्भ परीक्षण भी हो जाता है और वह व्यर्थ में दोबारा गर्भाधान करके गर्भपात के खतरे से बच जाता है|
(3) इस विधि में वीर्य को उचित स्थान पर छोड़ा जाता है जिससे वीर्य व्यर्थ में बर्बाद नहीं होता तथा इसमें ग्र्भ्धार्ण की संभावना अधिक होती है|

गर्भाधान का उचित समय व सावधानियाँ:-
                                        पशु के मद काल का द्वितीय अर्ध भाग कृ०ग० के लिए उपयुक्त होता है| गर्भाधान के लिए उपयुक्त होता है| गर्भाधान के लिए दूर से लाए लाभ प्रद होता है| पशु पालक को पशु को गर्भाधान के लिए लाते व लेजाते समय उसे डरना या मारना नहीं चाहिए क्योंकि इसे गर्भ धारण की अधिकांश पशुओं में मद च्रक शुरू हो जाता है, लेकिन ब्याने के 50-60 दिनों के बाद ही पशु में गर्भाधान करना उचित रहता है क्योंकि उस समय तक ही पशु का गर्भाशय पूर्णत: सामान्य अवस्था में आ पाता है| प्रसव के 2-3 माह के अंदर पशु को गर्भ धारण कर लेना चाहिए ताकि 12 महीनों के बाद गाय तथा 14 महीनों के बाद भैंस दोबारा बच्चा देने में सक्षम हो सके क्योंकि यही सिद्धांत दुधारू पशु पालन में सफलता की कुंजी है|

कृत्रिम गर्भाधान के लाभ व सीमायें

गर्भाधान के लाभ

प्राकृतिक गर्भाधान की तुलना में कृ०ग० के अनेक लाभ हैं जिनमें प्रमुख लाभ निम्नलिखित है:-
(1) कृत्रिम गर्भाधान तकनीक द्वारा श्रेष्ठ गुणों वाले सांड को अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकता है| प्राकृतिक विधि में एक सांड द्वारा एक वर्ष में 50-60 गाय या भैंस को गर्भित किया जा सकता है जबकि कृ०ग० विधि द्वारा एक सांड के वीर्य से एक वर्ष में हजारों की संख्या में गायों या भैंसों को गर्भित किया जा सकता है|
(2) इस विधि में धन एवं श्रम की बचत होती हसी क्योंकि पशु पालक कोसांड पालने की आवश्यकता नहीं होती|
(3) कृ०ग० में बहुत दूर यहां तक कि विदेशों में रखे उत्तम नस्ल व गुणों वाले सांड के वीर्य को भी गाय व भैंसों में प्रयोग करके लाभ उठाया जा सकता है|
(4) अत्योत्तम सांड के वीर्य को उसकी मृत्यु के बाद भी प्रयोग किया जा सकता है|
(5) इस विधि में उत्तम गुणों वाले बूढ़े या घायल सांड का प्रयोग भी प्रजनन के लिए किया जा सकता है|
(6) कृ०ग० में सांड के आकार या भर का मादा के गर्भाधान के समय कोई फर्क नहीं पड़ता|
(7) इस विधि में विकलांग गायों/भैंसों का प्रयोग भी प्रजनन के लिए किया जा सकता है|
(8) कृ०ग० विधि में नर से मादा तथा मादा से नर में फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचा जा सकता है|
(9) इस विधि में सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है जिससे मादा की प्रजनन की बीमारियों में काफी हद तक कमी आ जाती है तथा गर्भधारण करने की डर भी बढ़ जाती है|
(10)इस विधि में पशु का प्रजनन रिकार्ड रखने में भी आसानी होती है|

कृत्रिम गर्भाधान विधि की सीमायें:

कृत्रिम गर्भाधान के अनेक लाभ होने के बावजूद इस विधि की अपनी कुछ सीमायें है जो मुख्यत: निम्न प्रकार है|
(1) कृ०ग० के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति अथवा पशु चिकित्सक की आवश्यकता होती है तथा कृ०ग० तक्नीशियन को मादा पशु प्रजनन अंगों की जानकारी होना आवश्यक है|
(2) इस विधि में विशेष यंत्रों कीआवश्यकता होती है|
(3) इस विधि में असावधानी वरतने तथा सफाई का विशेष ध्यान ण रखने से गर्भ धारण की दर में कमी आ जाती है|
(4) इस विधि में यदि पूर्ण सावधानी न वरती जाये तो दूर वर्ती क्षेत्रों आठवा विदेशों से वीर्य के साथ कई संक्रमक बीमारियों के आने का भी भय रहता है|

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पशुओं के आहार में खनिज लवणों का महत्व

पशुओं के लिए खनिज लवण का मह्त्व:-
                                             पशुओं के लिए खनिज लवणों का उनके प्रजनन में अतिमहत्वपूर्ण स्थान है। शरीर में इनकी कमी से नाना प्रकार के रोग एवं समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। पशुओं में खनिज लवणों के कमी से पशुओं का प्रजनन तंत्र भी प्रभावित होता है, जिससे पशुओं में प्रजनन संबंधित विकार पैदा हो जाते है, जैसे पशुओं का बार-बार मद में आना , अधिक आयु हो जाने के बाद भी मद में नहीं आना, ब्याने के बाद भी मद में नहीं आना या देर से मद में आना या मद में आने के बाद मद का नहीं रूकना इत्यादि । इन विकारों के लिये उत्तरदायी कारणों में एक कारण खनिज लवणों की कमी भी हैं।
पशुओं के लिए खनिज लवण के विस्तृत जानकारी से पहले यह बताना आवश्यक है, कि खनिज लवण क्या है ?
किसी भी वस्तु के जलने पर जो राख बचती है, उसे भस्म या खनित कहतें हैं। यह बहुत ही थोड़ी मात्रा में प्रत्येक प्रकार के चारे-दाने तथा शरीर के प्रायः सभी अंगों मे पाये जाते है। प्राकृतिक रूप से लगभग ४० प्रकार के खनिज जीव-जन्तुओं के शरीर में पाये जाते है, लेकिन इसमें से कुछ अत्यन्त उपयोगी है। जिनकी आवश्यकता पशु के आहार में होती है। शरीर के आवश्यकतानुसार खनिजों को दो भागों में बाटते है।
एक जो खनिज लवण पशुओं के लिए अधिक मात्रा में आवश्यक है, जिनकी मात्रा को ग्राम में या प्रतिशत में व्यक्त करते है इनको प्रमुख खनित कहते है, जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम , सल्फर, मैग्निशियम तथा क्लोरीन।
दूसरे पशुओं के लिए खनिज लवण वे जो शरीर हेतु बहुत सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते है, जिसको पी.पी.एम. में व्यक्त करते है, ऐसे खनिजों को सूक्ष्म या विरल खनिज कहते है,जैसे लोहा, जिंक, कोबाल्ट, कापर, आयोडिीन, मैगनीज, मोलीब्डेनम, वेमियम, लोरिन, सेलेनियम, निकल, सिलिकान, टिन एवं वेनाडियम। यघपि दूसरे सूक्ष्म खनिज जैसे एल्यूमीनियम, आर्सेनिक , बेरियम, बोरान, ग्रोमीन, कैडमियम भी शरीर में पाये जातें है, परन्तु शरीर में इसकी भूमिका के बारे में अभी तक स्पस्ट जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी हें।
इस प्रकार कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम , सल्फर, मैग्नीशियम, क्लोरीन, लोहा तॉबा, कोबाल्ट, मैगनिज, जिंक एवं आयोडीन आदि पशुओं के लिए अति आवश्यक खनिज लवण है, जो जीवन एवं स्वास्थ्य रक्षा हेतु आवश्यक है। शरीर में पशुओं के लिए खनिज लवण के सामान्य कार्य की बात किया जाय तो कैल्शियम एवं फास्फोरस दॉत हड्डियों के बनने में आवश्यक है। दूधारू पशुओं के रक्त में कैल्शियम की कमी से दुग्ध ज्वर हो जाता है। सोडियम, पोटैशियम एवं क्लोरीन शरीर के द्रवों में परिसारक दबाब को ठीक बनाये रखते है तथा उनमें अन्य गुणों का सन्तुलन स्थापित करते है। रक्त में पोटैशियम, कैल्शियम तथा सोडियम का समुचित अनुपात हदय की गति तथा अन्य चिकनी मांसपेशियों को उत्तेजित करने एवं उनमें संकुचन की क्रिया सम्पन्न करने के लिए आवश्यक है। लौह लवण लाल रक्त कणों में हीमोग्लोबिन बनाने में आवश्यक होता है, जिसके कारण रक्त में आक्सीजन लेने की शक्ति पैदा होती है। इसके अलावा पशुओं के लिए खनिज लवण या तो शरीर के कुछ आवश्यक भाग को बनातें हैं या एन्जाइम पद्वति के आवश्यक तत्व बनाते है। इसके अतिरिक्त इनके कुछ विशेष कार्य भी होते है।
प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने वाले पशुओं के लिए खनिज लवण की बात की जाए तो (ग्रोमिन फोर्ट प्लस Growmin Forte Plus)ये मुख्यतः कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, तॉबा, कोबाल्ल्ट, मैगनित आयोडीन एवं जिंक है। इन तत्वों की कमी से पशुओं में मदहीनता अथवा बार-बार मद में आना एवं गर्भ धारण न करने की समस्यायें आती है। आहार में कैल्शियम की कमी के कारण अडांणु का निषेचन कठिन होता है, तथा गर्भाशय पीला तथा शिथिल हो जाता है। पशुओं के आहार में फास्फोरस के कमी से पशुओं में अण्डोतत्सर्ग कम होता है, तथा पशु का गर्भपात हो जाता है। अन्य सूक्ष्म खनिज लवण भी पशुओं में अण्डोत्पादन, शुवणुत्पादन, निषेचन, भ्रूण के विकास एवं बच्चा पैदा होने तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभातें है।
मुर्गियों में अण्डा उत्पादन हेतु कैल्शियम सहित अन्य खनिज लवण अति आवश्यक है। इनके आहार में कैल्शियम के कमी से अच्छी गुणवत्ता वाले अण्डे का उत्पादन प्रभावित होता है।
चारे में प्रोटीन, कार्बोहार्इड्रेट, मिनरल्स तथा विटामिनों की क्षमता बढ़ाने तथा कमी पूरी करने के लिए (अमीनो पॉवर Amino Power) नियमित रूप से दें | (अमीनो पॉवर Amino Power) नियमित रूप से देने पर उत्पादकता में कम से कम 25% की बढ़ोतरी होती है, वजन तेजी से बढ़ता है, रोग प्रतिरोधी छमता बढ़ती है और चारे पर भी खर्च कम आता है ।
अतः पशुपालक भाईयों को चाहिए कि इस तरह की समस्याओं को दूर रखने के लिए पशुओं को संतुलित आहार दें, अर्थात पशुओं के दाने एवं चारे में शर्करा या कार्बोहाइडेट, प्रोटीन,वसा, खनिज लवण तथा विटामिनों का सन्तुलित मात्रा में होना नितान्त आवश्यक होता है। इन पोषक तत्व के असन्तुलित होने के कारण ही कुपोषण जन्य रोग पैदा होते है।
पशुओं के आहार में सुखे चारे तथा हरे चारे का होना आवश्यक है । केवल हरा चारा या केवल सूखा चारा नहीं देना चाहिए, कम से कम दो – तिहाई सूखा चारा तथा एक तिहाई हरा चारा होना चाहिए। जहॉ तक दाना की बात है तो कोई एक प्रकार का दाना या खली नही देना चाहिऐ बल्कि इनका मिश्रण होना चाहिए। यदि एक कुन्टल दाना तैयार करना है तो २०-३० किग्रा खली, ३०-४० किग्रा चोकर, १५-२५ किग्रा, दलहनी फसलों के उत्पाद, १५-२५ किग्रा अदलहनी फसलों के उत्पाद, २ किग्रा खड़िया एवं १ किग्रा नमक लेकर भली भाति मिश्रित कर लेना चाहिए। प्रौढ़ पशुओं को निर्वाह हेतु ऐसे मिश्रित दाने की एक नियमित मात्रा एवं अन्य कार्यो जैसे प्रजनन एवं गर्भ हेतु १-१.५० किग्रा एवं दूध उत्पादन हेतु ढ़ाई से तीन किग्रा दूध पर १ किग्रा दाना निर्वाहक, आहार के अतिरिक्त देना चाहिए।
इस प्रकार से दिये गये आहार से पशुओं में खनिज लवणों की कमी की अधिकाशंत: की पूर्ति हो जाती है, परन्तु फिर भी इनमें से कुछ सूक्ष्म खनिज लवणों की कमी की पूर्ति नहीं हो पाती है जिसके लिए पशुओं के लिए खनिज लवण ( इम्यून  बुस्टर Immune Booster -Premix) उपलब्ध है,जो की काफी लाभदायक और त्वरित परिणाम देनेवाला है,  जिसको ५० से १०० ग्राम प्रतिदिन प्रति प्रौढ़ पशु को देना चाहिए। पशुओं के आहार में खिलायें जाने वाले विभिन्न चारो दानों, जैसे हड्डियों एवं मांस के चूर्ण में १५ से ६४ प्रतिशत, दो दालिय सूखी घासों में ७ से ११ प्रतिशत, खली एवं भूसी में ५-७ प्रतिशत, भूसा में ४-५ प्रतिशत, आनाज में १.५-३.० प्रतिशत एवं हरे चारे तथा साइलेज में १ से ३ प्रतिशत खनिज लवण पायें जाते हैं।
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दुधारू पशुओं को संतुलित आहार कैसे खिलाएं

दुधारू पशुओं के आहार संतुलित कैसे बनायें और खिलाएं?
दुधारू पशुओं के आहार संतुलित कैसे बनायें और खिलाएं,पशुपालको के लिए ये बात काफी मायने रखता है ।संतुलित आहार उस भोजन सामग्री को कहते हैं जो किसी विशेष पशु की 24 घन्टे की निर्धारित पौषाणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। संतुलित राशन में कार्बोहार्इड्रेट, वसा और प्रोटीन के आपसी विशेष अनुपात के लिए कहा गया है।

दुधारू पशुओं के आहार को सन्तुलित राशन में मिश्रण के विभिन पदाथोर् की मात्रा मौसम और पशु भार तथा उसकी उत्पादन क्षमता के अनुसार रखी जाती है। एक राशन की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है ‘एक भैंस 24 घण्टे में जितना भोजन करती अन्तर्ग्रहण  है, वह राशन कहलाता है।’ डेरी राशन या तो संतुलित होगा या असंतुलित होगा। असंतुलित राशन वह होता है जोकि भैंस को 24 घण्टों में जितने पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है वह देने में असफल रहता है जबकि संतुलित राशन ‘ठीक’ भैंस को ‘ठीक’ समय पर ‘ठीक’ मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करता है। दुधारू पशुओं के आहार में प्रोटीन, कार्बोहार्इड्रेट, मिनरल्स तथा विटामिनों की मात्रा पशु की आवश्यकता अनुसार उचित मात्रा में रखी जाती है |

चारे में प्रोटीन, कार्बोहार्इड्रेट, मिनरल्स तथा विटामिनों की छमता बढ़ाने तथा कमी पूरी करने के लिए ग्रोवेल एग्रोवेट का टॉनिक और दवा नियमित रूप से दें |ग्रोवेल एग्रोवेट अपनी प्रोडक्ट्स की गारंटी देतें हैं तथा ग्रोवेल एग्रोवेट का टॉनिक और दवा नियमित रूप से देने पर उत्पादकता में काम से काम 25% की बढ़ोतरी होती है और पशुओं रोग प्रतिरोधी छमता बढ़ती है और चारे पर भी खर्च काम आता है |

भैंस को जो आहार खिलाया जाता है, उसमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उसे जरूरत के अनुसार शुष्क पदार्थ, पाचक प्रोटीन तथा कुल पाचक तत्व उपलब्ध हो सकें। भैंस में शुष्क पदार्थ की खपत प्रतिदिन 2.5 से 3.0 किलोग्राम प्रति 100 किलोग्राम शरीर भार के अनुसार होती है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 400 किलोग्राम वजन की भैंस को रोजाना 10-12 किलोग्राम शुष्क पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है। इस शुष्क पदार्थ को हम चारे और दाने में विभाजित करें तो शुष्क पदार्थ का लगभग एक तिहार्इ हिस्सा दाने के रूप में खिलाना चाहिए।
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उत्पादन व अन्य आवश्यकताओं के अनुसार जब हम पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा निकालते हैं तो यह गणना काफी कठिन हो जाती है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि जो चारा पशु को खिलाया जाता है उसमें पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा ज्ञात करना किसान के लिए लगभग असंभव है। ऐसा इसलिए है कि पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों की मात्रा प्रत्येक चारे के लिए अलग होती है। यह चारे की उम्र/परिपक्वता के अनुसार बदल जाती है। अनेक बार उपलब्धता के आधार पर कर्इ प्रकार का चारा एक साथ मिलाकर खिलाना पड़ता है। किसान चारे को कभी भी तोलकर नहीं खिलाता है। इन परिस्थितियों में सबसे आसान तरीका यह है कि किसान द्वारा खिलाये जाने वाले चारे की गणना यह मान कर की जाये की पशु को चारा भरपेट मिलता रहे। अब पशु की जरूरत के अनुसार पाचक प्रोटीन और कुल पाचक तत्वों में कमी की मात्रा को दाना मिश्रण देकर पूरा कर दिया जाता है। इस प्रकार भैंस को खिलाया गया आहार संतुलित हो जाता है।

दुधारू पशुओं के आहार संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें ?
पशुओं के दाना मिश्रण में काम आने वाले पदार्थों का नाम जान लेना ही काफी नही है। क्योंकि यह ज्ञान पशुओं का राशन परिकलन करने के लिए काफी नही है। एक पशुपालक को इस से प्राप्त होने वाले पाचक तत्वों जैसे कच्ची प्रोटीन, कुल पाचक तत्व और चयापचयी उर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी भोज्य में पाये जाने वाले तत्वों के आधार पर संतुलित दाना मिश्रण बनाने में सहसयता मिल सकेगी। नीचे लिखे गये किसी भी एक तरीके से यह दाना मिश्रण बनाया जा सकता है, परन्तु यह इस पर भी निर्भर करता है कि कौन सी चीज सस्ती व आसानी से उपलब्ध है।

1. मक्का/जौ/जर्इ 40 किलो मात्रा
बिनौले की खल 16 किलो
मूंगफली की खल 15 किलो
गेहूं की चोकर 25 किलो
मिनरल मिक्चर 02 किलो
(1 किलो चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट और 1 किलो इम्यून  बुस्टर प्री-मिक्स)
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो
2. जौ 30 किलो
सरसों की खल 25 किलो
बिनौले की खल 22 किलो
गेहूं की चोकर 20 किलो
मिनरल मिक्चर 02 किलो
(1 किलो चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट और 1 किलो इम्यून  बुस्टर प्री-मिक्स)
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो
3. मक्का या जौ 40 किलो मात्रा
मूंगफली की खल 20 किलो
दालों की चूरी 17 किलो
चावल की पालिश 20 किलो
मिनरल मिक्चर 02 किलो
(1 किलो चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट और 1 किलो इम्यून  बुस्टर प्री-मिक्स)
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो
4. गेहूं 32 किलो मात्रा
सरसों की खल 10 किलो
मूंगफली की खल 10 किलो
बिनौले की खल 10 किलो
दालों की चूरी 10 किलो
चौकर 25 किलो
मिनरल मिक्चर 02 किलो
(1 किलो चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट और 1 किलो इम्यून  बुस्टर प्री-मिक्स)
नमक 01 किलो
कुल 100 किलो
5. गेहूं, जौ या बाजरा 20 किलो मात्रा
बिनौले की खल 27 किलो
दाने या चने की चूरी 5 किलो
बिनौला 15 किलो
आटे की चोकर 20 किलो
मिनरल मिक्चर 02 किलो
(1 किलो चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट और 1 किलो इम्यून  बुस्टर प्री-मिक्स)
नमक 01 किलो
कुल 100 किलो
ऊपर दिया गया कोर्इ भी संतुलित आहार भूसे के साथ सानी करके भी खिलाया जा सकता है। इसके साथ कम से कम 4-5 किलो हरा चारा देना आवश्यक है।

दुधारू पशुओं के आहार ,दाना मिश्रण के गुण व लाभ

• यह स्वादिष्ट व पौष्टिक है।
• ज्यादा पाचक है।
• अकेले खल, बिनौला या चने से यह सस्ता पड़ता हैं।
• पशुओं का स्वास्थ्य ठीक रखता है।
• बीमारी से बचने की क्षमता प्रदान करता हैं।
• दूध व घी में भी बढौतरी करता है।
• भैंस ब्यांत नहीं मारती।
• भैंस अधिक समय तक दूध देते हैं।
• कटडे या कटड़ियों को जल्द यौवन प्रदान करता है।

दुधारू पशुओं के आहार संतुलित दाना मिश्रण कितना खिलायें

1. शरीर की देखभाल के लिए:
• गाय के लिए 1.5 किलो प्रतिदिन व भैंस के लिए 2 किलो प्रतिदिन

2. दुधारू पशुओं के लिए:
• गाय प्रत्येक 2.5 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
• भैंस प्रत्येक 2 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना

3. गाभिन गाय या भैंस के लिए:
• 6 महीने से ऊपर की गाभिन गाय या भैंस को 1 से 1.5 किलो दाना प्रतिदिन फालतू देना चाहिए।

4. बछड़े या बछड़ियों के लिए:
• 1 किलो से 2.5 किलो तक दाना प्रतिदिन उनकी उम्र या वजन के अनुसार देना चाहिए।

5. बैलों के लिए:
• खेतों में काम करने वाले भैंसों के लिए 2 से 2.5 किलो प्रतिदिन
• बिना काम करने वाले बैलों के लिए 1 किलो प्रतिदिन।

नोट : जब हरा चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो तो उपरलिखित कुल देय दाना 1/2 से 1 किलो तक घटाया जा सकता है।

चारे में आमतौर सबसे ज्यादा भूसे का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बहुत कम पौष्टिक तत्व होते हैं। पशु को सही पोषण मिले इसके लिए राइस ब्रैन, चोकर और चना दिया जाना ज़रूरी है। साथ ही हरे चारे को उसके आहार में जरूर शामिल करें जो कि सूखे चारे से ज्यादा अच्छा होता है। अच्छी नस्ल की मुर्रा भैंस या होल्सटीन फ्रीजियन गाय का वजन 450 से 500 किग्रा है। उसे अच्छी सेहत और पर्याप्त मात्रा में दूध उत्पादन के लिए हर 100 किग्रा भार पर 2.5 किग्रा सूखा चारा देने की जरूरत होती है। करीब 12.5 किग्रा पशु के एक दिन के आहार में शामिल होना चाहिए। इसमें सूखे और हरे चारे का अनुपात 50:50 फीसदी यानि बराबर होना चाहिए। जब पशु दूध के लिए तैयार हो रहा हो तो उसके संतुलित आहार में सूखा चारा, हरा चारा और दाना मिलाकर देना जरूरी है। जिसमें सूखा चारा 6.5 किग्रा, हरा चारा करीब 30 किग्रा और दाना एक किग्रा हर रोज देेना चाहिए। जब पशु दूध देने लायक हो जाए तो सूखा चारा और हरा चारा उतना ही रखें पर दाने को बढ़ा कर चार किलो और गर्भावस्था में दाना घटा कर दो किलो कर दें।

हरा चारा

हरा चारा पशु चाव से खाते हैं। यह सूखे चारे की अपेक्षा जल्दी पचता है। दूध का उत्पादन बढ़ाता है। इसमें सूडान घास, बाजरा, ज्वार, मकचरी, जई और बरसीम आदि शामिल हैं। पशुपालकों को चाहिए कि वो हरे चारे में दलिया या दलहनी दोनों तरह के चारे शामिल करें। इससे पशुओं में प्रोटीन की कमी बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है।

आठ से 10 घंटे के अंतर पर चारा ज़रूरी

खाने में सूखा चारा, हरा चारा, और पशु आहार को शामिल करें ताकि सभी पोषक तत्व सही मात्रा में मिल सकें। फलीदार सब्जी भी लाभकारी होती है। बरसीम, रिजका, ग्वार आदि सूखे चारे में मिला कर खिलाएं। इन फलियों को बिना चारे के खिलाने से पाचन क्रिया में गड़बडी और अफारा रोग होने की संभावना होती है। पशु एक दिन में 35 से 40 लीटर पानी पीता है। इसलिए साफ पानी हमेशा उपलब्ध होना चाहिए। आहार में प्रोटीन पशुओं की बढ़त और अच्छी सेहत के लिए, कार्बोहाइडे्रट शक्ति देता है और शरीर को गर्म रखने में मदद करता है। ये तन्दुरूस्ती व उचित प्रजनन के लिए जरूरी होता है। टूटे हुए गेहूं, ज्वार या बाजरे की दलिया को अच्छी तरह उबाल कर नमक, गुड़ या शीरे में मिलाकर खली, खनिज लवण के साथ देने से अच्छा उत्पादन मिल सकता है।

आईएसआई निर्धारित पशु आहार के मानक

 20-21 फीसदी प्रोटीन
2.5-3 फीसदी चिकनाई
1 फीसदी कैल्शियम
0.5 फीसदी फास्फोरस
4 फीसदी सेड सिलिका
12 फीसदी फाइबर
3 फीसदी खनिज लवण
5000 आईयू /केजी विटामिन ए /डी
2.5-3 फीसदी चिकनाई
1 फीसदी कैल्शियम
0.5 फीसदी फास्फोरस
4 फीसदी सेड सिलिका
12 फीसदी फाइबर
3 फीसदी खनिज लवण
5000 आईयू /केजी विटामिन ए /डी

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मुर्गी पालन का काम कैसे शुरू करें

मुर्गी पालन का काम कैसे शुरू करें
मुर्गीपालन ब्यवसाय एक ऐसा व्यवसाय है जो आपकी आय का अतिरिक्त साधन बन सकता है। बहुत कम लागत से शुरू होने वाला यह व्यवसाय लाखों-करोड़ों का मुनाफा दे सकता है। इसमें शैक्षणिक योग्यता और पूंजी से अधिक  अनुभव और मेहनत की दरकार होती है। आज के समय में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। ऐसे में युवा मुर्गीपालन को रोजगार का माध्यम बना सकते हैं।
मुर्गीपालन ब्यवसाय के लिये आवश्यक व्यक्तिगत कौशल :
पोल्ट्री फार्म के व्यवसाय में कुछ कौशल होना अनिवार्य हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं-
पोल्ट्री का ज्ञान हो ,जिसमें मुर्गियों की देखभाल भी शामिल है।
मुर्गियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने का ज्ञान।
मुर्गियों को बीमारी से कैसे बचाना है, इसकी जानकारी।
पोल्ट्री व्यवसायी के लिए मेहनती होना जरूरी है।
पोल्ट्री फार्म के आसपास के इलाके के रखरखाव का ज्ञान हो।
इस क्षेत्र के व्यवसायी के लिए स्वस्थ होना जरूरी है।उसे अस्थमा और दूसरी सांस संबंधी बीमारी नहीं होनी चाहिए।

सफल लाभदायक और मुर्गीपालन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण सुझाव:-
पशुपालन बैज्ञानिकों का मानना है कि यदि योजनाबद्ध तरीके से मुर्गीपालन किया जाए तो कम खर्च में अधिक आय की जा सकती है। बस तकनीकी चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है। वजह, कभी-कभी लापरवाही के कारण इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को भारी क्षति उठानी पड़ती है। इसलिए मुर्गीपालन में ब्रायलर फार्म का आकार और बायोसिक्योरिटी (जैविक सुरक्षा के नियम) पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पशुपालन बैज्ञानिकों  के मुताबिक मुर्गियां तभी मरती हैं जब उनके रखरखाव में लापरवाही बरती जाए। मुर्गीपालन में हमें कुछ तकनीकी चीजों पर ध्यान देना चाहिए। मसलन ब्रायलर फार्म बनाते समय यह ध्यान दें कि यह गांव या शहर से बाहर मेन रोड से दूर हो, पानी व बिजली की पर्याप्त व्यवस्था हो। फार्म हमेशा ऊंचाई वाले स्थान पर बनाएं ताकि आस-पास जल जमाव न हो। दो पोल्ट्री फार्म एक-दूसरे के करीब न हों। फार्म की लंबाई पूरब से पश्चिम हो। मध्य में ऊंचाई 12 फीट व साइड में 8 फीट हो। चौड़ाई अधिकतम 25 फीट हो तथा शेड का अंतर कम से कम 20 फीट होना चाहिए। फर्श पक्का होना चाहिए। इसके अलावा जैविक सुरक्षा के नियम का भी पालन होना चाहिए। एक शेड में हमेशा एक ही ब्रीड के चूजे रखने चाहिए। आल-इन-आल आउट पद्धति का पालन करें। शेड तथा बर्तनों की साफ-सफाई पर ध्यान दें। बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित रखना चाहिए। कुत्ता, चूहा, गिलहरी, देशी मुर्गी आदि को शेड में न घुसने दें। मरे हुए चूजे, वैक्सीन के खाली बोतल को जलाकर नष्ट कर दें, समय-समय पर शेड के बाहर डिसइंफेक्टेंट (Viraclean) विराक्लीन का छिड़काव व टीकाकरण नियमों का पालन करें। समय पर सही दवा का प्रयोग करें। पीने के पानी में (Aquacure) एक्वाक्योर का प्रयोग करें।
सही और अच्छी कंपनी का दवा प्रयोग करें , केवल दवा प्रयोग ही ना करें यह भी देखें इसका सही रिजल्ट आ रहा है या नहीं । सही क्वालिटी का चूजा होना अति आवश्यक है , इस बात की पता करें आपके इलाके में किस हेचरी या कंपनी का चूजा का रिजल्ट अच्छा है ,उसी हेचरी या कंपनी का चूजा खरीदें । अच्छी क्वालिटी का फीड भी होना आवश्यक है ।अच्छी कंपनी की दवा , फीड , चूजा और बायो-सिक्योरिटी के नियमों का पालन एक लाभदायक मुर्गी पालन ब्यवसाय के लिए अति -आवश्यक है।
मुर्गा मंडी की गाड़ी को फार्म से दूर खड़ा करें। मुर्गी के शेड में प्रतिदिन 23 घंटे प्रकाश की आवश्यकता होती है। एक घंटे अंधेरा रखा जाता है। इसके पीछे मंशा यह कि बिजली कटने की स्थिति में मुर्गियां स्ट्रेस की शिकार न हों। प्रारम्भ में 10 से 15 दिन के अंदर तक दो वर्ग फीट के कमरे में 40 से 60 वाट के बल्ब का प्रयोग करने से चूजों को दाना-पानी ग्रहण करने में सुविधा होती है। इसके बाद 15 वाट बल्ब का प्रकाश पर्याप्त होता है।

विष्ठा से खाद भी तैयार कर सकतें हैं :

मुर्गी की विष्ठा का खाद के रूप में भी उपयोग किया जाता है, जिससे फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है। 40 मुर्गियों की विष्ठा में उतने ही पोषक तत्त्व होते हैं जितने कि एक गाय के गोबर में होते हैं।

मुर्गीपालन ब्यवसाय से संबद्ध अन्य व्यवसाय:-
पोल्ट्री सिर्फ चिकन और अंडों का व्यवसाय नहीं है। अब यह व्यवसाय इतना एडवांस हो गया है कि युवक और युवतियां इस में अपना कैरियर ब्रायलर, प्रोसेसिंग प्लांट मैनेजर, अनुसंधान, शिक्षा, बिजनेस, कंसल्टेंट, प्रबंधक, विज्ञापक, उत्पाद प्रौद्योगिकीविद, फीडिंग प्रौद्योगिकीविद, क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर, हैचरी मैनेजर, पोल्ट्री वैटरिनेरियन, एग्रीकल्चरल इंजीनियर और जेनेटीसिस्ट के रूप में बना सकते हैं।
पोल्ट्री व्यवसाय में आय की कोई सीमा नहीं है। इस कार्य क्षेत्र में आय आपकी मेहनत पर ही निर्भर करती है। आपके व्यवसाय का प्रसार कितना है आपकी आय भी उसी अनुपात में होगी।  अनुसंधान और शिक्षण के क्षेत्र में प्रतिमाह 40 से 50 हजार रुपए कमाए जा सकते हैं। निजी पोल्ट्री फार्म में अनुभव और योग्यता के आधार पर 20 हजार से 75 हजार प्रतिमाह कमाए जा सकते हैं।
मुर्गी पालन का काम के लिए ऋण (Poultry farming subsidy):

पोल्ट्री फॉर्म के लिए सरकार आंशिक रूप से ऋण देती है. कल्पना कीजिये कि आप पोल्ट्री फॉर्म की स्थापना करना चाहते हैं और इसका बजट 1 लाख रूपए का बनाया है, हालांकि इसका बजट 1 लाख से ऊपर का होता है. फिर भी यदि 1 लाख रूपए का बजट हो, तो सरकार इस पर जनरल कैटेगरी वालों को 25% प्रतिशत यानि 25000 रू की सब्सिडी और यदि आप एसटी/ एससी कैटेगरी के हों, तो 35% प्रतिशत रू 35000 की सब्सिडी देती हैं. ये सब्सिडी NABARD और एमएएमसई द्वारा दी जाती है।
मुर्गी पालन का काम के लिए लोन के लिए कैसे अप्लाई करें (How to apply Loan for poultry farming):

सरकार इस व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की योजनायें लागू करती है, किन्तु लोगों तक इस योजनाओं की जानकारी नहीं पहुँच पाती और वे इनके लाभ से वंचित रह जाते हैं. सब्सिडी के बाद जितने पैसे की आवश्यकता होती है वह ऋण के मध्यम से मिल जाता है. इस तरह से आपको अपने घर से एक पैसा लगाने की ज़रुरत नही पड़ती है. कई बार लोग विभिन्न तरह की भ्रांतियों जैसे ऋण आदि के विषय में सोच कर इन योजनाओं का लाभ नहीं उठाते हैं. इस काम के लिए कोई भी बैंक आसानी से ऋण दे देता है. दरअसल भारत सरकार द्वारा देश के विभिन्न बैंकों को ये निर्देश दे रखा है कि वे फार्मिंग के लिए लोन दें. अतः वे फार्मिंग ऋण देने के लिए कटिबद्ध है. साथ ही सरकार फार्मिंग ऋण का रिस्क भी उठाती है.

मुर्गी पालन का काम के लिए व्याज दर (Poultry farm interest rates):

इस व्यवसाय के लिए लिए गए ऋण पर 0% की  दर लागू होती है, यानि मूलधन के अलावा आपको किसी तरह का व्याज बैंक को लौटाने की ज़रुरत नहीं पड़ती है.
मुर्गियों की विभिन्न जातियों में से मुर्गी पालन व्यवसाय को ध्यान में रखकर इनमें से चुनाव करना चाहिए –

क)  अधिक अंडा देने वाली – व्हाइट लेग हार्न, मिनार्का आदि।

ख) विपुल मांस देले वाली- असील, कार्निस, व्हाइट राक।

ग) मांस और अंडा दोनों के लिए- रोड आइलैंड रेड, अस्ट्रालार्प इत्यादि।

भारत में पाली जाने वाली मुर्गियों को दो बड़े समूहों में बाँटा जा सकता है- एक देशी और दूसरा उन्नत या विदेशी। देशी मुर्गियाँ छोटे और कम अंडे देती हैं। औसत साल में 50 से 55 अंडे। अत: व्यवसाय के लिए इनका चुनाव ठीक नहीं है। विदेशी नस्लों में जो हमारी जलवायु के अनुरूप ढल जाती गयी हैं उनमें व्हाइट लेग हार्न तथा रोड आइलैंड रेड प्रमुख हैं। केवल अंडा प्राप्त करने के लिए व्हाई लेग हार्न सबसे अच्छा है। यह सफेद रंग की, लाल तूरावाली और पीली पैर वाली मुर्गी है। यह साल में  200 से 250 अंडे देती है। वैसे सफल मुर्गी पालक इससे 300 अंडे तक प्राप्त हो सकते हैं। अगर मांस और अंडे दोनों के लिए मुर्गी पालना हो तो रोड आइलैंड रेड तथा ब्लैक अस्ट्रालार्प  काफी अच्छा है। यह लाल अथवा भूरा होता है इसमें मांस की मात्रा अधिक होती है। साथ ही यह साल में औसतन 160-200 अंडे देती है। मांस पैदा करने वाली नस्ल को ब्रोआयालर्स नस्ल कहते हैं। केवल मांस पैदा करने के लिए ‘व्हाइट कार्निस’ ‘व्हाइट रौक’ और न्यूहैम्पशायर’ नस्ल की मूर्हियाँ अच्छी होती है। 2 महीने में 4 किलो दाना खिलाकर 1 किलो की मुर्गी तैयार हो जाती है।

मुर्गीपालन के लिए हमेशा ऐसी मुर्गियाँ पाली जाए जो अधिक और बड़े अंडे देने वाली हों\ अच्छी मुर्गी का चुनाव करते वक्त निम्न लक्षणों को ध्यान में रखना चाहिए। अच्छी मुर्गी के सिर चौड़े तथा विस्तृत होते हैं सकरे या गोलाकार नहीं। कलंगी लाला और चमकदार होती हैं आंखे, तेजस्वी होती है, छाती विस्तृत और चौड़ी होती है। पेट बड़ा होता है। त्वचा कोमल तथा लचीला होता है। जघनास्थी विस्तृत तथा चौड़ी होता है तथा योनिमुख अंडाकार और मुलायम होता है।

नर का चुनाव करते वक्त यह ध्यान में रखना चाहिए कि अच्छे नर से अच्छी संतति प्राप्त होती है। अत: अच्छे लक्षण और प्रजनन कार्यसक्षम मुर्गा का ही चुनाव करना चाहिए। आजकल हमारे देश में देशी मुर्गियों का सुधार करने के लिए उन्हें विदेशी मुर्गों से नस्ल सुधार कराया है। इसके उत्पन्न संकर मुर्गियों की अंडा देने की सक्षम बढ़ती है। इसके अतिरिक्त कई मुर्गी फार्मों में अंडा देने वाली माँसल मुर्गियों की अनेक विदेशी नस्लों से संकरन द्वारा उप नस्ल भी पैदा की जाती है। जो काफी अधिक अंडा देती है जैसे- एस्ट्रोव्हाइट, हाईलाइन आदि।
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 https://youtu.be/ZzIhu0fV4nA
धन्यवाद
"स्वस्थ पशु समृद्ध किसान"
बकरी पालन:-एक संक्षिप्त विवरण

बकरी पालन बैंक लोन योजना|
किसान भाईयो आज हम एक नई योजना को लेकर आए हैं जिस योजना का नाम है बकरी पालन योजना जी हां किसान भाईयो योजना का नाम है बकरी पालन योजना,बहुत से ऐसे लोग हैं जो बकरी पालन योजना से अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं परंतु उनको समझ में नहीं आता है हम बकरी पालन का व्यवसाय किस प्रकार से शुरू करें?

दोस्तों यदि आप बकरी पालन व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले निम्न बातों का ध्यान रखना होगा कि हम किस प्रकार की बकरियों को पालेंगे,बकरियों का रहने का स्थान किस प्रकार का होना चाहिए या फिर अन्य और कई बातें तो चलिए दोस्तों किस प्रकार से हम बकरी पालन शुरू करेंगे इसकी पूरी जानकारी को नीचे पढ़ें!
1. बकरी के शेड बनाने के लिए सही जगह का चुनाव करें।
2. बकरी के सही नस्ल का चुनाव करें। जैसे:-राजस्थान में सिरोही,जमनापुरी(तोतापुरी),जखराना.. आदि।
3. बकरियों का समय-समय पर टीकाकरण और डीवॉर्मिंग।
4. अन्य जैसे जंगली जानवरों कुत्तों से देखभाल..!

बकरी पालन योजना के लाभ:-
सूखा प्रभावित क्षेत्र में खेती के साथ आसानी से किया जा सकने वाला यह एक कम लागत का अच्छा व्यवसाय है|
जरूरत के समय बकरियों को बेचकर आसानी से नकद पैसा प्राप्त किया जा सकता है।
इस व्यवसाय को करने के लिए किसी प्रकार के तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं पड़ती।
यह व्यवसाय बहुत तेजी से फैलता है।
इसलिए यह व्यवसाय कम लागत में अधिक मुनाफा देना वाला है।
इनके लिए बाजार स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध है।
अधिकतर व्यवसायी गांव से ही आकर बकरी-बकरे को खरीदकर ले जाते हैं।

किसान को बकरी पालन लोन कैसे मिलेगा:-
सबसे पहले किसान का किसी भी राष्ट्रीय बैंक में करंट एकाउंट होना चाहिए |
यह एकाउंट करीब एक साल पुराना तथा एकाउंट बकरी पालन के किसी नाम से होना चाहिए |
उस एकाउंट में बकरी के खरीद बिक्री का कम से कम एक साल का लेनदेन होना चाहिए |
अगर एक साल का रिटर्न फाइल है तो अच्छा है |
इस के बाद आप नजदीकी पशुपालन विभाग या बैंक में जाएँ तो बैंक अधिकारी आप को आपके बैंक के लेनदेन के आधार पर आप को उतना पैसा आवंटित करेगा|

पात्रता :
व्यक्तिगत कृषक जिन्हें भेड एवं बकरी पालन का समुचित अनुभव हों। महिला,अनुसूचित जाति एवं जनजाति व BPL के पालकों को प्राथमिकता दी जायेगी।

भेड एवं बकरी पालन पर सरकार द्वारा दी जानें वाली सहायता:-
उद्येश्य:- भेड़ बकरी पालन(40+2)
कुल वित्तीय परिव्यय (राशि लाखों में):-1.00 लाख
ब्याज मुक्त ऋण राशि:-योजना लागत की 50 प्रतिशत राशि(अधिकतम रुपये 50,000/)

ब्याज दर:-
वर्तमान प्रचलित ब्याज दर। समय - समय पर परिवर्तित ब्याज दर देय होगी।

प्रतिभूति:-
कृषक स्वयं के स्वामित्व की कृषि भूमि।

धन्यवाद
स्वस्थ पशु समृद्ध किसान

Friday, July 27, 2018

पशुओ के दस्त का घर बैठे ईलाज कैसे करे।

सभी किसान भाइयों को रामराम🙏,आज हम बात करेंगे एक ऐसी बिमारी के बारे मे जो आमतोर पर पशुओ को होती रहती है!
दस्त:-
लक्षण:- पेचिश में आंतों की सूजन,पिचकारी की तरह बार-बार गोबर आना, आंखें धसना, तापमान घटना गोबर में आंव आना.                                     
कारण:- वर्षा में हरी घास, कीटाणु से व दूषित आहार इत्यादि से तथा ऋतु परिवर्तन व अन्य बीमारियों के कारण से!
घरेलु उपचार:- 30 ग्राम खडिया/चाक या मुलतानी मिट्टी + 30 ग्राम केओलिन + 15 ग्राम कत्था तीनो को एक साथ मिलाकर चावल के मांड के साथ मिलाकर दिन में दो बार दे या 30 ग्राम खडिया/चाक या मुलतानी मिट्टी + 30 ग्राम केओलिन +10 ग्राम सौंठ तीनो को एक साथ मिलाकर चावल के मांड के साथ मिलाकर दिन में दो बार देवे!
चित्रित सहित अधिक जानकारी के लिए  सभी किसान भाइयों को रामराम🙏,आज हम बात करेंगे एक ऐसी बिमारी के बारे मे जो आमतोर पर पशुओ को होती रहती है!
दस्त:-
लक्षण:- पेचिश में आंतों की सूजन,पिचकारी की तरह बार-बार गोबर आना, आंखें धसना, तापमान घटना गोबर में आंव आना.                                     
कारण:- वर्षा में हरी घास, कीटाणु से व दूषित आहार इत्यादि से तथा ऋतु परिवर्तन व अन्य बीमारियों के कारण से!
घरेलु उपचार:- 30 ग्राम खडिया/चाक या मुलतानी मिट्टी + 30 ग्राम केओलिन + 15 ग्राम कत्था तीनो को एक साथ मिलाकर चावल के मांड के साथ मिलाकर दिन में दो बार दे या 30 ग्राम खडिया/चाक या मुलतानी मिट्टी + 30 ग्राम केओलिन +10 ग्राम सौंठ तीनो को एक साथ मिलाकर चावल के मांड के साथ मिलाकर दिन में दो बार देवे!
चित्रित सहित अधिक जानकारी के लिए https://youtu.be/K4_av8kXmBs  जाकर देखे!!